अमृता देवी और खेजडली का चिपको आन्दोलन

amrita devi and chipko movement of khejdali

अमृता देवी (बेनीवाल) जिन्होंने अपनी तीन पुत्रियों के साथ पेड़ों को बचाने के लिए 1730 में शहीद हुई उनके साथ 363 अन्य बिश्नोई B खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए शहीद हो गए तो चलिए जानते हैं

खेजड़ली गांव-

ख खेजड़ली राजस्थान राज्य के जोधपुर जिले का एक गांव है यह नाम खेजड़ी के वृक्षों से आया है इस गांव में 363 बिश्नोईयो ने अपने गांव के खेजड़ी के हरे वृक्षों को बचाने के लिए जान दी थी

 

पेड़ो को बचने के लिए अमृता देवी का बलीदान-

चिपको आन्दोलन के की सुरुआत एक काले मंगलवार के दिन हुयी यह भादवे की दसवी थी जब जोधपुर के महाराजा अभय सिंह ने खेजडली के पेड़ काट कआर मंगवाए थे .

महाराजा के आदमी जब पेड़ काटने लगे तो पेड़ो की आवाज सुन अमृता देवी और उनकी तीनो पुत्रिया बाहर आई.और उम्होंने पेड़ो को काटने से शक्त मना  कर  दिया

महाराज के आदमियों में कहा की  अगर वो पेड़ो को काटने देंगे तो उन्हें पैसा मिलेगा और अगर पेड़ काटने से रोका तो सजा होगी| अमृता देवी ने उन सेनिकों की बातो को इनकार करते हुए एक ही नारा दिया की अगर “सिर साठे रुंक रहे तो भी सस्तो जान” और उन्होंने पेड़ो से चिपक कर कहा की अगर आप पेड़ो कको काटोगे तो हमें भी साथ में काटना पड़ेगा|

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इसी तरह उनकी बेटियों भग्गू,आशु,रतनी,ने भी यही किया और पेड़ो से चिपक गये | यह खबर पुरे गाँव में फेल गयी और 83गाँव के सभी बिश्नोई  एकत्रित हो गये और सभी ने अपनी जान को किसी पेड़ से कम कीमती मानते हुए  से चिपक  और राजा के बे रहम सेनिको ने एक एक कर के सब को पेड़ो के साथ काट दिया| खेजडली में इस आन्दोलन में पेड़ो को बचने के लिए 363 लोगो ने अपना बलिदान दिया|

अमृता देवी विश्नोई पुरुस्कार-

राजस्थान और मध्यप्रदेश सरकार ने अमृता देवी विश्नोई स्मृति अवार्ड भी रखा हैं जो इन राज्यों में वन्य जीवो की रक्षा और प्रकति के सरक्षण करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने पर दिया जाता हैं

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